Thu. Oct 29th, 2020

रोकि नइँ सकत केओ- अशोक दत्त

(रचनाकार कवि/ लेखक अशोक दत्तद्वारा लिखित)

बेर-बेर टुटै छी
टूटि-टूटि खसै छी
खण्ड-खण्ड जोडि क
फेर हम उठै छी,
दोसर कते तेडि सकत
ने हमरा झिकझाेरि सकत
किछ अपने छथि हमर
तँए मन ई दुखाइत अछि
अपनक परिभाषामे
मस्तिष्क ओझराइत अछि,
केकरा बुझी अप्पन
आ के हमर आन छथि
अपना-अपना ला सब
एत्त महान छथि,
देखै छी जेम्हरे
व्यूहए देखाइत अछि
तँए की छोडब हम
व्यूह एक दिन तोडब हम
पानि बनि बढब हम
बान्ह, आरि तोडब हम,
अजु॔न जेकाँ लक्ष हमरो
स्पष्ट देखाइत अछि
गन्तव्यधरि पहुँचबे करब
हमरा बुझाइत अछि ।

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