• नित्यानन्द मण्डल

चुँडा–लाई खएबासँ पहिने ठिठुरल छल लोक । धुन्हि फटिते नहि छल । जाडक जुआएल कनकन्नी । शनैःशनै साझ जुआन भऽरहल । ओ चौक पर गुम्म ठाड छलाह । बाजऽक प्रयासमे कंठ अवरुद्ध भेल जा रहल छलनि । की बाजथु? कोना बाजथु? आनक लेल तऽ ई गप्प फुसि सन,मुदा हिनका लेल, हृद्यक समस्त गहिराईसँ निकलल भावक उद्वेगमे चहँुदिश अहुरिया कटैत । तखने हुनक जेबीमे राखल मोबाइल टनटनाएल । अड्डा पर पहँुचबाक सूचना भेटलनि । ओहि महानूभावक आग्रहकँे ओ सहजै अस्वीकार नहि कऽ सकलनि । एहि तरहेँ कानोकान एक दोसरकेँ खबरि भेलनि । डगहर कातक चिन्ताहरण–बुद्धिजीवी मिलन केन्द्रमे जुमय लागल सभ ।

रामेश्वर,विनोद,घुटर,कारी आ भुट्टा सभ जुमि गेल छल ।जाइतेँ गरम पानि, पापडसँ स्वागत भेल छलनि । हाईहेल्लो करैत सभ अप्पन–अप्पन विचार दऽ रहल छल । किछु टेबुल पर ओहिना मुरही छिडियाएल, काँटकुश,सिँगरेटक धुँवाइत ठुठ्ठी फेकल, खालीबोतल, किछु गिलासक पेनीमे किछु जाम धयले । एहि पर दू चारिटा बिलाडि सभ सेहो निँघास करैत,मँुडाबला हड्डी आ काँटके कचरैत एहि टेबुल परसँ ओहि टेबुल पर छडपैत,छल । खन टेबुलक तर दऽ कऽ जाीहसँ मोछ बघारैत । कतेकोबेर हरकएला पर अपन आदतसँ बाज नहि अबैत छल । ई कहुँ जे ओहि टेबुल सभ परक कतेको गहिँकीसभ खा–पि कऽ ढेकारक सँग सोफ–सुपारी गलठैत छलाह तऽ, केओ रजनीगन्धा तुलसी फाँकि रहल छलाह ।

किनको हिँक नहि भरल छलनि तऽ काउन्टर प्याक मारि रहल छलाह । केओ मुत्रालय खोजी रहल छलाह तऽ केओ जएबाक लेल नम्बरमे लागल छलाह । केओ पान दोकान दिश जएबालेल डेग बढावि रहल छलाह । केओ बिल फडिछबैत अपन जेबी हल्लुक कऽ रहल छलाह । किछु टेबुल पर खुकुरी रम आ गरम पानिक अर्डर तऽ कतहँु जीन तऽ कतौँ आरएस आ सिँग्नेचरक फरमाईस । बेचारे दोकनदार फुरबैत फुरबैत परेशान छल । कखनो मुरही तऽ कखनो लहसुनक चटनी, कँचका मिरचाई, भुटन मःम परसैत–परसैत हाफी छोडैत छल ओ । केओ हिन्दी तऽ केओ मैथिली–नेपालीमे एना ने अप्पन शान बघारैत प्रभुत्वक प्रदर्शन कऽ रहल छलाह जे पुलिसबा अएबाक डरसँ करेज कँपैत सिँकिर–सिँकिर करैत छल ओ । जँ ई कहि जे घेँघाउज भऽ रहल छलैक तऽ बेसी नीक ।

माछक सुगन्ध तऽ नाक होइते जीह पर सहजै टप्पसँ बहरा जाइत छल । ताबतेमे नील टिनोपाल देल, झकाझक साफ–उज्जड धोती आ खाँदीक कुर्ता पहिरने पाण्डेजीकेँ अवैत देखि अभिभादनकसँग एक्कहिँ स्वरमे मजमामे सामिल होएबाक लेल आग्रह कएलकएनि । पाण्डेजीक बास्ते भाकुर माछक चक्करका–चक्करका पेटी मँगाओल गेलनि । आईकाल्हि ओ ड्रिंक्समे हिवस्कीसँ बेसी वाइन पसिन करैत छथिन्ह । ओहो सिक्किमके हुअए तऽ बाते अजुदा ।
ओना ई बात फराक जे ओ दुसधटोलीमे ठर्रा, घोँघीक चिखना, सिद्धरी रोटी, मुसहर टोलीमे ताडी ताबा भुजा आ कललटोलीमे महुआक स्वाद सेहो नहि नेने छथि से गप्प नहि । नवयुवकक महिम पाँडेजी जहियासँ संविधान सभाक चुनावमे अप्रत्यक्ष रुपेँ चुनाव जीतलाह अछि, तहियासँ हुनक रहन–सहन, खानपीन, रङ्ग–ढङ्ग सभ किछु बदलि गेल छनि । संघियताक प्रसँगमे जनताक राय आ माहौल बुझबाक लेल जिल्ला दौडहामे छथि ।

एहिक्रममे गृह जिल्लाक अप्पन बौद्धिक कार्यकर्तासभसँग टेबुल टकमे छथि । जिनका सभक बलेँ ओ चुनाव जितैत आएल छथि । ओहिमे किछु पत्रकार, व्यापारी, बुद्धिजीवी आ समाजसेवी सेहो अछि । सरिसोक मसल्लाहमे लाहे लाहे तरलहवा, धुँवाइत कुटिया खएबा लेल मात्र एहि तरहक मजलिशमे बैसवाक हुनक मोन होइत छनि । काठमाण्डुमे क्याफे, डान्सवार, मसाज सेन्टर आ ठमेलक आनन्द सेहो हुनका एहि माछक आँगा फिक्का लगैत छनि ।

चियर्स भेल । पटियाला २–२ पैक जखन चढलै तऽ गप्पक फुलझरी छुटऽ लगलनि । जाहिँ नीतिक प्रयोग कऽ अपन तमाम प्रतिस्पर्धीकेँ चुनावी मैदानमे धाराशायी कएने छलाह से हुनका एक दिश जँ कुशल राजनीतिज्ञ सिद्ध कऽ देने छल तऽ दोसर दिश जिल्लाक आजुक नवयुवकक आदर्श पुरुष । जेहने सुदर्शन व्यक्तित्व तेहने मिश्रीसन बोल । सभ चुप्प । सभ प्रतिक्षा कऽ रहल छलाह हुनक अभिव्यक्तिक ।

वाइनक चुस्की लैत अपन मोनव्रत भंग करैत ओ बजलाह,‘एखनि राज्य पूर्नसंरचनाक गप्प उठि रहल अछि । ताहि सम्बन्धमे जनतासँग विर्मश करबाक उद्देश्यसँ जिल्ला अएलहँु अछि ।’ बाहरमे साँझेसँ पानि जेकाँ शीत बरसैए । चारुकात मेघक जमघट । हवाक तोर पर कखनो खूब पैघ पैघ बँुद झहरय लगै तऽ देह सिहरा दै, मुदा तपाओनक बले बुझाए जे सभ अण्डरसँ मजबुत रहैक । पाण्डेजीक बातकेँ बीचहिँमे लोकैत रामेश्वर बाजल,‘मिथिला राज बनत की नहि?’पाण्डे जी हुनका आश्वस्त करबाक प्रयत्न कएलकएनि, ‘हमरालोकनि बहुत पछुआएल छी । तैं मोनमे हिलोर उठितहँु सदनमे व्यक्त नहि कऽ पबैत छी ।’मैथिली पर बेर बेर आघात भेल । मिथिलाक नाम पर एखनिधरि ५ गोटेमात्र सहिद भेलाह । परमाश्चर्य तऽ तखन लागल जे एकरालेल एको गो आधिकारिक पार्टी नहि ।’ओ अप्पन बातकेँ लहसुनक चटनीसँग मथैत जोडैत गेलाह,‘अहुँमे हमरालोकनि टीक–दाढी, पाग–पगडीमे, जनौं–डराडोरिमे बाँटल छी । तैँ सक नहि लागि रहल अछि । मिथिलामे मधेशक नाम पर सिट हँसौतिनिहारसभ सेहो मिथिलाक नाम गुम्म अछि ।’

समय सभकेँ सिखा दैत अछि, मुरैक कतरा चिबैत करिया बाजल,‘हँ,अँ, जाधरि जनौंमे बान्हल, कुँञ्जीसँ मैथिलीक सन्नुक खुजैत रहत ताधरि मैथिलीक याहए दशा रहत । विनोद सिँगरेटक लेसि कऽ लम्बा कश तनैत पिनकि उठल,हमरालोकनिक कर्तव्य ई होएबाक चाही जे समाजक समक्ष अपन विचार ओहि प्रकारे प्रस्तुत करी जे शिक्षाप्रद होएबे करय सँगहि सामाजिक संहिष्णुता संरक्षित रखैक । सामन्तवाद ककरो बपौती नहि छैक । ओ देशकाल, पात्र आ परिस्थिति अनुसार बदलैत रहै छैक, ओ जोड देलनि । सामन्त शब्दक जन्म जातिसँ नहि अपितु सामथ्र्यसँ अंकुरित होइत छैक । ओ एक्के साँसे बाजैत गेलाह,‘एहिमादे सन्तुष्ट होएबाक हुअए तऽ आब सभ जातिक नेता,अभियन्ता, चिकित्सक वा अन्य पदाधिकारी लोकनि राज्यक केन्द्रिय राजधानीमे विराजमान छथि । आग्रह जे एकबेर सर्भे कऽ लेल जाए, सभ स्पष्ट भऽ जाइत । वर्ण नहि अगिलह भऽ सकैत अछि,वर्ग दुःखदायी होइत छैक । जाति कोनो होउक जकरा वैभव आ पराभव भऽ जाइत छैक । ओहिमेसँ किछुए लोक कमजोरकेँ आतंककित करैत छै । जेना ईलाकामे चोरक संख्या कम रहै छैक तथापि सभकेँ सावधान रहए परैत छैक । सामन्त विचारधाराक लोक कम छैक तथा भबडाक अधिक तैँ लोक त्रस्त अछि । पाण्डेजीकेँ रहल नहि गेलनि, ओ फेर एक बोतल वाइन मँगौलनि, खाली गिलासमे वाइन ढारैत बाजल,जाहि क्षेत्रक जनता आ नेताक पेट एक नहि छैक,शहिद हएबाक लेल तत्पर नहि छैक ततए मिथिला राज्यक सपना दिवास्वप्न अछि । बजैत–बजैत पाण्डेजीक नजरि पडैत छनि–किछु जमातक टेबुल पर । कनेक साहसिक हर्कत मचाबएबाला सभकेँ ओहि साँझ ओहिठाम जुटानी भेल छल ।

राति परैत गेलाक बाद ओ सभ प्रायशः जम्मा होइत अछि । ओकरासभकेँ देखि पाण्डेजीकेँ ठमेलक स्मरण होबए लगलनि, हे भगवान ! अहँुठाम पूरे सिनेमा जेकाँ होइत छैक । नम्महर–नम्महर झोँटा, नहि दाढी कटौने आ मोछ सेहो ओहने अलबत । सभ मग्न । केओ पैँक मारैत तऽ केओ ताराविहिन आकाश दिशदेखि रहल, मानु जे ध्यान कऽ रहल होइक । ओकरासभक गल्र्सफ्रयाण्ड सेहो केओ काँख तर बैसल तऽ केओ अपन व्याय फ्रायण्डक माथ अपन स्तनपर राखि स्पर्श करयबैत सुमसुम सहलाह रहल । ओहि लडकीक ओढनी जखन जखन हावामे उडैक तखन तखन सिँगरेटक गन्ध चारुदिश छिडिया जाई, पसरय लगैक । ओ सभ सिँगरेट तानि रहल छल । लाइनमे एकटा फुकैत दोसरकेँ हाथेहाथ पास करैत ।

कनेक दुर मोमबत्तीक छायाँमे केओ केओ बदमाशी सेहो कऽ रहल दृश्य चलमलारहल छल । दोसर दिश लडका लडकीक भनभनाहट सेहो सुनवामे आवि रहल छल । एहिँ तरहेँ टटके तुरते चरम सन्तुष्टिमे पहँुचल एकटा स्त्री चिचिहाट गुञ्जयमान भेल जकर पुरुष साथी स्त्री देह छोडि नग्न अवस्थामे छल । ओहिठाम एकटा गोर उज्जड धपधप करैत युवती दिश सभ पुरुष आकर्षित भऽ रहल छल । युवतीक केश रेशमी, पैंघ छल । नीक जेकाँ कसल नहि भेलाक कारण ओकर चोलीसँ तन्नेरीवयक स्तन उछटि रहलसन अनुभूति भऽ रहल छलनि हुनका ।

नेता जीक ध्यान तोडबैत फेर रामेश्वर बाजल, आब काठमाण्डुमे मात्र नहि जनकपुरो एहने बनि रहल अछि । एहिमे ध्यानमग्न रहब उचित नहि । करियाक बाम आँखि फडकि उठलनि । हुनका नजरिमे पाँण्डे जीक आकृति शनिग्रहसँ मिलैत चमकि उठल ।

स्वाद परिवर्तन करैत काँकटेल लेबाक मोन भेलनि, विना सोचनहिँ पाँण्डे जीक मुँहसँ बहरा गेलनि, तरक्का ओल्ड दरबारक ब्ल्याक चिमनी ला ब आ सोडा आ आइस सेहो अहगरेसँ लाबऽ झट्टसँ । पाण्डेजी बाजल, ई फानल टच छैक । आब हम एकटा घोषण करैत छियो जे अगिल्ला स्थानीय तहक चुनावमे हम अपन लभेरुकेँ एहि नगरपालिकासँ उम्मेदवार बनाबए चाहैत छी । हुनका बातकेँ बीचहिँमे लोकैत घँुटर बाजल, मधेशवादी मोर्चा कहैत छैक जे चुनाव होवहि नहि देबै । ओ बातक लच्चछड जोडैत गेल,मोर्चा कहैत छै जे बलु जातधरि अधिकार नहि मिलतैक ताधरि चुनाव नहि होबऽ देबै ।
पाण्डेजी ब्ल्याक चिमनीक आनन्द उठबैत बाजल, बुडिनहितन रे, भितरे भितर सभ तयारी भऽ रहल छैक । बन्नुक नोँख पर चुनाव हएतैक । बडीकालसँ दम धयने, गुम्म भऽ सडक पर ठाड पत्रकार अपन भ्रान्स निकालनि, तखन एहि चुनावक की अर्थ भेलैक? जाहिमे सीमान्तकृत समूदायक आवाज नहि सुनल जाइक, चुनाव तऽ राजा सेहो करौनेही रहैक । फेर वाहए पैसाबाला, पावरबाला, जातिबाला चुनाव लडतैक तऽ याहए फेर संसदीय व्यवस्थाक नग्न रुप देखार हएतैक ।

 दोकान बन्द हएबाक निर्धारित समय ९ः ०० बजेसँ टरिक करिब ११ः३० बजेक ओन्हपोन्ह होइत हएतैक । पुलिसवाके डरसँ अदकल दोकानबाला बेर बेर टेबुल पर जा कऽ खन अपने नेहोरा करैय, खनबेटाके पठयबै । कहैक सर आउर आई भऽ गेलै, घरु जाइके हय । काल्हि परसु छौडाके पकरि कऽ ल गेल रहै । बड सोरस पैरवी आ पैसा सेहो बड खरचा लागल, दौडधुपमे मग्गज उनटि गेल । दोकानदारी सेहो चौपट्ट भऽ गेल । परोसिया दोकानबालासभ चुगिला गिरी सेहो करैक हई । ओकरासुनकेँ हमर दोकानक प्रगति नहि सोहाय हई । आब कुच्चो रहियो नहि गेल हई । चलल जाय, साहेब । मुँहमारु भोटभाटके । सभदिन वाहए खेती होइतैक छैक । जहिया भोट हएतैक तहिया सोचल जएतैक । हमरा आउर अहिँके छी ने । गोर लगैत छी, चलल जाउ, सभदिन सेवा करबाक मौका देल जाए । ओम्हर सभके मोबाइल सेहो टनटनाई । सभक घरसँ पत्नीक फोन अबै । घर अएबाक तगेदा सुरु रहैक । सभ एक दोसरकेँ परतारैत रहैए जे याहए आवि गेलहुँ, चौक पर छी, पान खा रहल छी । एकसँ एक्कैस झुठ बजैत जा रहल छलाह । केओ किनकोसँ कम नहि । ओतबेमे पाण्डे जीके रहल नहि गेलनि, कहलनि रे पत्नी आ पुलिस की करतैक । ओकरासभके बुझल छैक जे पाण्डेजीक अएलाहसँ आई सहरमे रौनक छैक । अवेर रातिधरि सहर चकाचक रहतैक । तोँ निफिकर रह । पुलिसवा किछु ने विगारि सकतहुँ,ओकरा हमहिँ सरुवा करा कऽ एतय अनने छियै, चुनावक खातीर,। देखबहि लगवियै फोन, अखने स्कर्टिङ्ग करएला आवि जएतैक ।

जोड हिसावकिताब कतेक भेलौ आ ई सभ कि लेताह से पुछहि आ हमरा मात्र एक प्याक चिमनी,एक कच्चा सेउ, आ रजनीगन्धा लेने आ की ताबतेहिँमे पुलिसक गाडीक साइरन बाजल पोँ पोँ पोँ……। टेवाटाहि कन्छी कटैत सभ टहलल आ दोकानदारबाके मूँह अपने सन, हाई हाई सभ किछु धरए पटक लागल,सभटा बाँल्बक स्वीच आँफ कएलक । ओम्हर पाण्डे जी आरामसँ दैए रहल छलाह की पुुलिसबा बाजल को हो …? खोइ पसले…? अँए केटाहरु ओर्ल त। की सभके सिट्टीपिट्टी गुम्म । दोकानदारबाके अपनेसुन मुँह लटकौने…। पुलिसबा चिचिआएल, हान..हान…हान, पकड…पकड…पकड ।।।
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