शहरी माहौलमे मनमोहक ग्राम्य शिल्पसिर्जना

  • शब्द एवम् तस्विरः श्यामसुन्दर यादव

मिथिला मधेशमे विआह पञ्चमीस’ (कातिक–अगहनस’) शुरुआत भ’ जाइत अछि, विआहक लगन । ई क्रम अषाढ महिनाभरि चलैत अछि ।

एहि भूमीमे होयवाला विआहमे डोम समुदायद्वारा बनाओल डाल दौरासहित बाँसक सामग्रीक अनिवार्यता रहैत अछि । मुदा बढैत आधुनिकताक कारणें ई सामग्रीसभक प्रयोग घटैत जा’ रहल अछि । यद्यपी शिल्पकारितामे निपूण डोम समुदायके जिवन–जिविका बाँसक सामग्री बिक्रीस’ चलैत आबिरहल अछि ।

परम्परागत पेशाके रुपमे अपनावैत आएल ई समुदायक लोक सभ प्रायः भूमीहीन रहलाक कारणें पोखरीक महाड, नदी कात, डगरबाट कात अलानीमे रहैत आबि रहल अछि । अर्थोपार्जनक स्थिती चिन्ताजनक रहल एहि जातिक शिक्षाक अवस्था सेहो अति न्यून अछि । राज्यक निकाय आ’ सरकारी नोकरीमो पहुँच सेहो शुन्य अछि । समुचित खानपानक अभाव रहल डोम समुदायक लोक सभक स्वास्थ्यमे सेहो पहुँच नहि अछि । समयमे इलाज नहि भेलाक कारणें अस्वाभाविक मृत्यु भेनाइ समान्यजँका बनि गेल अछि ।

देशमे त परिवर्तन आएल मुदा एकर अनुभूती एखनो डोम जातिमे कोनो परिवर्तनके सिरखार देखएमे नहि आबिरहल अछि । समस्ये समस्याक पहाड बीच जीवनयापन करैत आबिरहल डोम जातिक महिला सभ शिल्कारितामे पुरुषक तुलनामे निपुण होइत छथि ।

विआहक समयमे शिल्पसिर्जनके समुचित बजारक अभाव त अछिये, श्रमके समुचित मूल्य सेहो नहि मिलरहल डोम समुदाय असन्तुष्टि अभिव्यक्त करैत छथि । एहि बीच शहरी माहौलमे मनमोहक ग्राम्य शिल्पसिर्जना ल’कए जा’ रहल डोम महिला ।  (पथिक) /राजविराज